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सोलन रेलवे स्टेशन (Solan Railway Station, Narrow Gauge Railway Station)Solan

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  सोलन रेलवे स्टेशन (Railway Station Solan) सोलन का रेलवे स्टेशन, नैरो गेज कालका - शिमला रेल लाइन के मध्य स्थित स्टेशन है। सोलन रेलवे स्टेशन स्टेशन आकार में भले ही छोटा है, परन्तु यहां पर आरक्षण एवं टिकट काउंटर सुचारू रूप से चलाएं जाते हैं, इसके अलावा यहां पर यात्रियों के ठहरने, कैंटिन, पानी तथा शौचालय की भी उचित व्यवस्था है सोलन रेलवे स्टेशन   यहां पर रेल (टाॅय ट्रेन) की आवाजाही कुछ इस प्रकार है:- सोलन रेलवे समय सारणी

बेज़ा रियासत (Beja Princely State), Solan

            बेजा रियासत (Beja Princely State)         बेजा  रियासत ( सोलन ) लगभग 7 से 8 किमी. में फैली रियासत थी। यह रियासय कुठाड़ के दक्षिण और महलोग के पश्चिम में स्थित थी।       गर्व चंद , बेजा के प्रथम शासक थे। बेजा कईं वर्षो तक कहलूर के अधीन रहा था। लेकिन, जब 1790ई॰ में हिन्दूर ने कहलूर पर आक्रमण किया तब बेजा कहलूर से स्वतंत्र हो गया।               बेजा रियासत के प्रमुख शासक-                                ठाकुर मान चंद (Thakur Maan Chand)                                   मान चंद  बेजा के 24वें शासक थे। ये एक कुश...

मांगल रियासत (Mangal Princely State), Solan

              मांगल रियासत (Mangal Princely State)                   मान्गल रियासत का क्षेत्रफल 20 वर्ग किमी. था। ये रियासत बिलासपुर के उत्तर में सतलुज नदी के किनारें पर स्थित थी।  कहलूर के राजा ने ये  रियासत मारवाड़ के अत्री राजपूत मंगल सिंह को दी थी और उनके नाम पर इस रियासय का नाम मांगल पड़ा। गोरखों ने इस रियासत पर अधिकार कर लिया था, जिस कारण ये कहलूर से स्वतंत्र हो गई थी। गोरखा युद्ध के बाद ये रियासत अंग्रेजी  सरकार ने राणा बाहुदर सिंह को 20 दिसंबर, 1815 ई॰ में सनद द्वारा प्रदान की।            1921 ई॰ में अंगरेज सरकार ने राणा से सभी प्रशासनिक अधिकार छीन लिए और बाघल रियासत के वज़ीर लाला भगवान दास को मांगल रियासत का भी वज़ीर नियुक्त किया।   15 अप्रैल,1948 में मांगल का विलय अर्की में किया जो वर्तमान मे सोलन का एक हिस्सा है।

महलोग रियासत (Mehlog Princely State), Solan

            महलोग रियासत (Mehlog Princely State)  ‌                            महलोग रियासत ( सोलन ) नालागढ़ और कुठाड़ के मध्य स्थित थी। इस रियासत का क्षेत्रफल 70‌ वर्ग किमी. था।  एक उल्लेख के अनुसार महलोग की राजधानी नालागढ़ के समीप 'पट्टा' थी, यह राजधानी 21 पीढ़ियों तक रही थी। महलोग रियासत का संस्थापक आयोध्या से आया हुआ कोई व्यक्ति था, उसके नाम के विषय में कोई निश्चित जानकारी नही है।     महलोग रियासत के कुछ मुख्य शासक           संसार चंद(Sansar Chand)-                   राजा संसार चंद के समय में गोरखों ने महलोग रियासत पर अधिकार कश्र लिया था। उस समय संसार चंद भागकर हिंदूर के राजा रामसरन के पास जाकर रहने लगा। 4 सितंबर, 1815 ई॰ में गोरखा युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों न...

कुनिहार घाटी (Kunihar Valley), Solan

        कुनिहार घाटी (Kunihar Valley) सोलन की यह घाटी 'कुणी खड्ड'  से शुरू होती है 'तकुरदिया गांव'  तक जाती है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 100 मीटर है। इसी घाटी में कुनिहार रियासत स्थित थी। कुनिहार रियासत की  मुख्य फ़सलें - गेहूं, चना, मक्का, दालें और गन्ना हैं।

गोरखटिल्ला (Gorakhtilla), Solan

            गोरखटिल्ला (Gorakhtilla)   सोलन जिला के बद्दी औद्योगिक नगर से 3 किमी. दूर हरियाणा के जिला पंचकुला में पिंजौर - स्वारघाट राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोरखनाथ गांव में स्थित किला, गोरखटिल्ला के नाम से जाना जाता है।  बताया जाता है कि इस किले के निर्माण का कार्य महाराजा पटियाला ने अपने वज़ीर को सौंपा था।   जनश्रुतियों‌ के अनुसार यह किला बहुत सुंदर हुआ करता था, परन्तु फिर भी महाराजा के वज़ीर ने इसके निर्माण के लिए दिए गए धन का एक बड़ा हिस्सा हड़प लिया था।      और जब किलें का निर्माण पूरा हुआ तब महाराजा ने इसे देखने की इच्छा व्यक्त की। राजा के क्रोध के डर से बचने के लिए उस वजीर ने राजा को जानबूझ़कर दलदल वाला रास्ता बताया जिसे राजा के लिए पार करना संभव नहीं था,अत: राजा ने वह किला उस वजीर को दान में दे दिया।   विख्यात वैद्य विद्यासागर ने इसे उस वजीर से मोल में खरीदा था। इस किले के बारे में कहा जाता है कि जब इसकी पहली मंज़िल के बाद जितना भी निर्माण किया जाता था वह सब ढह जाता था, इसलिए इस किलें क...

मलौण किला (Malaun Fort / Kila), Solan

          मलौण किला (Malaun Fort) सोलन और बिलासपुर की सीमा पर जोगिन्द्र सिंह द्वारा बनाया गया मलौण किला है। इस क़िले की हालत जरजर हो चुकी है। अंग्रेज- गोरखा युद्ध में गोरखा सेनानी अमर सिंह थापा इसी किलें में शहीद हुए थे। क़िले में आज भी बहुत सी ऐतिहासिक दर्शनीय वस्तुएँ मौजूद हैं। क़िले के चारों ओर गहरी खाई है, जिस कारण क़िले तक दुश्मन का पहुँचना दुष्कर था। यहां दो तोपें भी हुआ करती थी, गोरखा युद्ध के समय एक गोला बिलासपुर के खेल मैदान में गिरा था।